मंदिरों में दान की सुरक्षा को लेकर दिए गए मध्य प्रदेश के उज्जैन में एक बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्र पुरी महाराज और एक महामंडलेश्वर द्वारा मंदिरों में कार्यरत पुजारियों के लिए ड्रेस कोड और तलाशी व्यवस्था लागू करने संबंधी दिए गए सुझावों का अखिल भारतीय पुजारी महासंघ ने तीखा विरोध किया है। महासंघ ने इन बयानों को पुजारियों का अपमान बताते हुए भविष्य में ऐसे बयान दोहराए जाने पर विरोध प्रदर्शन और पुतला दहन की चेतावनी दी है।
क्या कहा था संतों ने?
मंदिरों में दान की राशि की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्र पुरी महाराज ने सुझाव दिया कि मंदिरों में सेवा देने वाले पुजारियों के कुर्तों में जेब नहीं होनी चाहिए, ताकि दान की चोरी जैसी घटनाओं पर रोक लगाई जा सके।
वहीं महामंडलेश्वर शांति स्वरूपानंद ने मंदिरों में कार्यरत पुजारियों और कर्मचारियों के लिए एक समान ड्रेस कोड लागू करने की बात कही। साथ ही उन्होंने मंदिर में प्रवेश और निकास के समय मेटल डिटेक्टर के माध्यम से उनकी नियमित जांच किए जाने का भी सुझाव दिया।
पुजारी महासंघ ने जताई कड़ी आपत्ति
अखिल भारतीय पुजारी महासंघ के अध्यक्ष महेश पुजारी ने इन बयानों को दुर्भाग्यपूर्ण और तथ्यहीन बताया। उन्होंने कहा कि शैव परंपरा के मंदिरों में पुजारी कुर्ता पहनते ही नहीं हैं, ऐसे में इस प्रकार का बयान देना संतों की जानकारी पर सवाल खड़े करता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ घटनाओं के आधार पर पूरे पुजारी समाज को बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि अधिकांश पुजारी पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अपनी सेवा दे रहे हैं।
पहले अपने अखाड़ों की व्यवस्था देखें
महेश पुजारी ने कहा कि अखाड़ा परिषद को दूसरों पर टिप्पणी करने से पहले अपने अखाड़ों और उनसे जुड़े संस्थानों की व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने बगलामुखी मंदिर से जुड़े दान चोरी के मामले का हवाला देते हुए कहा कि वहां लगे आरोप ट्रस्टियों और कर्मचारियों पर थे, लेकिन बिना वजह पुजारियों को निशाना बनाया जा रहा है।
पुतला दहन की चेतावनी
पुजारी महासंघ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि भविष्य में पुजारियों के खिलाफ इस तरह के अपमानजनक बयान दिए गए, तो संगठन प्रदेशभर में विरोध प्रदर्शन करेगा और रविंद्र पुरी महाराज का पुतला दहन कर अपना विरोध दर्ज कराएगा।
फिलहाल इस बयान को लेकर धार्मिक और सामाजिक हलकों में बहस तेज हो गई है। एक पक्ष इसे मंदिरों में पारदर्शिता और जवाबदेही से जोड़कर देख रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे पूरे पुजारी समाज की छवि को धूमिल करने वाला बयान बता रहा है।












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