हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में इन दिनों “वेज बिरयानी” को लेकर छिड़ा विवाद चर्चा का केंद्र बना हुआ है। हाल ही में कुछ संतों और धार्मिक संगठनों ने शहर में अभियान चलाकर दुकानों और ठेलों पर लिखे “वेज बिरयानी” शब्द को हटाकर उसकी जगह “वेज पुलाव” लिखने की मांग की है। संतों का तर्क है कि “बिरयानी” शब्द पारंपरिक रूप से मांसाहारी व्यंजन से जुड़ा माना जाता है और हरिद्वार जैसी धार्मिक नगरी की सांस्कृतिक पहचान के अनुरूप नहीं है।
कथनी और करनी पर उठने लगे सवाल
इस विरोध के बीच संत समाज के कुछ वर्गों पर दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप भी लगने लगे हैं। शहर के नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों का कहना है कि यदि किसी शब्द का विरोध केवल इसलिए किया जा रहा है क्योंकि उसे उर्दू या मुस्लिम संस्कृति से जोड़कर देखा जाता है, तो फिर वही संत और धार्मिक संस्थाएं विभिन्न समुदायों, विशेषकर मुस्लिम महिला-पुरुषों का अपने आश्रमों, भंडारों और सामाजिक आयोजनों में स्वागत क्यों करती हैं?
आलोचकों का कहना है कि भारत की संस्कृति सदियों से विविधताओं को आत्मसात करती रही है। हिंदी भाषा में सैकड़ों ऐसे शब्द शामिल हैं जिनकी जड़ें उर्दू, फ़ारसी, अरबी और अन्य भाषाओं में हैं। इन शब्दों का प्रयोग आम जनजीवन के साथ-साथ धार्मिक मंचों पर भी लंबे समय से होता आया है। ऐसे में किसी एक शब्द को धार्मिक पहचान के आधार पर विवाद का विषय बनाना समाज में अनावश्यक विभाजन पैदा कर सकता है।
सोशल मीडिया पर छिड़ी तीखी बहस
सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर बहस तेज हो गई है। एक वर्ग संतों के अभियान का समर्थन करते हुए इसे धार्मिक और सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ा विषय बता रहा है, जबकि बड़ी संख्या में लोग इसे प्रतीकात्मक राजनीति और अनावश्यक विवाद करार दे रहे हैं।
कई लोगों का सवाल है कि जब आश्रमों और धार्मिक आयोजनों में सभी धर्मों और समुदायों के लोगों का स्वागत किया जाता है, तब केवल एक खाद्य पदार्थ के नाम को लेकर इतना विरोध क्यों? क्या भाषा और खानपान को धर्म के आधार पर परिभाषित किया जाना चाहिए, या फिर उन्हें सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामाजिक समरसता के नजरिये से देखा जाना चाहिए?
भाषा बनाम पहचान की बहस
जानकारों का मानना है कि शब्दों का अर्थ समय के साथ बदलता रहता है। आज “वेज बिरयानी” देशभर में एक सामान्य शाकाहारी व्यंजन के रूप में स्वीकार की जाती है। ऐसे में केवल नाम के आधार पर किसी व्यंजन का विरोध करना कितना तर्कसंगत है, यह भी बहस का विषय बन गया है।
दूसरी ओर, अभियान चला रहे संतों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी समुदाय विशेष का विरोध नहीं, बल्कि हरिद्वार की धार्मिक और सांस्कृतिक मर्यादा को बनाए रखना है। उन्होंने दुकानदारों से “वेज बिरयानी” की जगह “वेज पुलाव” शब्द अपनाने की अपील की है और भविष्य में ऐसे अन्य नामों के खिलाफ भी अभियान चलाने के संकेत दिए हैं।
विवाद अब भोजन से आगे निकल चुका है
फिलहाल, वेज बिरयानी से शुरू हुआ यह विवाद अब केवल एक खाद्य पदार्थ के नाम तक सीमित नहीं रह गया है। यह बहस भाषा, धर्म, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक समरसता जैसे व्यापक मुद्दों तक पहुंच चुकी है।
धर्मनगरी में उठे इस विवाद ने संत समाज की कथनी और करनी को लेकर भी नए सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा धार्मिक विमर्श के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक चर्चाओं का भी अहम विषय बना रह सकता है।
वेज बिरयानी पर संतों का विरोध, लेकिन आश्रमों में मुस्लिमों का स्वागत! दोहरे मापदंडों पर उठे सवाल












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