दो अखाड़ों की हठधर्मिता से फीका पड़ सकता है हरिद्वार अर्धकुंभ-2027, 2003 जैसी चुनाव प्रक्रिया अपनाने की मांग

हरिद्वार। वर्ष 2027 में प्रस्तावित हरिद्वार अर्धकुंभ से पहले अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के भीतर नेतृत्व और चुनाव प्रक्रिया को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। संत समाज के एक वर्ग ने परिषद की वैधता और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए वर्ष 2003-04 की तर्ज पर सर्वसम्मति से नए चुनाव कराने की मांग की है।
श्री महंत गोपाल गिरि महाराज ने कहा कि दो अखाड़ों की हठधर्मिता के कारण अखाड़ों की एकता प्रभावित हो रही है, जिसका असर अर्धकुंभ-2027 की गरिमा और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर भी पड़ सकता है। उनका कहना है कि यदि स्वयं परिषद के पदाधिकारी विवाद को “आठ बनाम पांच अखाड़ों” का बता रहे हैं, तो बहुमत स्पष्ट रूप से आठ अखाड़ों के पक्ष में है। ऐसे में लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप समाधान निकाला जाना चाहिए।
गोपाल गिरि महाराज ने वर्ष 2003 के त्र्यंबकेश्वर कुंभ का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय नौ अखाड़ों ने जूना अखाड़े का बहिष्कार किया था। बाद में वर्ष 2004 में उज्जैन में सभी पक्षों के बीच सहमति बनने पर बहिष्कार समाप्त हुआ और अखाड़ा परिषद के चुनाव कराए गए। उन्हीं चुनावों में निर्वाणी अनी अखाड़े के महंत ज्ञानदास अध्यक्ष तथा जूना अखाड़े के महंत परमानंद सरस्वती मंत्री चुने गए थे।
उन्होंने आरोप लगाया कि वर्ष 2004 के बाद अखाड़ा परिषद के नियमित चुनाव नहीं कराए गए और लंबे समय तक कुछ पदों पर एक ही अखाड़े का वर्चस्व बना रहा। उनके अनुसार जूना अखाड़ा लगातार मंत्री पद पर बना हुआ है, जबकि निरंजनी अखाड़े के शंकर भारती करीब 19 वर्षों तक परिषद के अध्यक्ष रहे। इसके बाद महंत नरेंद्र गिरि ने अध्यक्ष पद संभाला।
गोपाल गिरि महाराज ने कहा कि संत परंपरा में कुल 13 अखाड़े हैं और परिषद की परंपरा हमेशा सर्वसम्मति एवं लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर आधारित रही है। उनका मानना है कि वर्तमान विवाद का समाधान भी संवाद, सहमति और निष्पक्ष चुनाव के माध्यम से ही संभव है।
उन्होंने मांग की कि वर्ष 2003-04 की तरह सभी 13 अखाड़ों को साथ लेकर अखाड़ा परिषद के चुनाव कराए जाएं, ताकि संत समाज में एकता बनी रहे और हरिद्वार अर्धकुंभ-2027 का आयोजन सौहार्दपूर्ण एवं गरिमामय वातावरण में संपन्न हो सके।
हालांकि, इन दावों और आरोपों पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद या संबंधित अन्य पक्षों की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। विवाद के बीच संत समाज की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले समय में सभी अखाड़ों के बीच सहमति बनती है या नहीं।

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