संत समाज में सियासी संग्राम! हरिगिरि पर साधा निशाना, त्रिकाल भवंता के तीखे तेवर

अर्द्धकुंभ 2027 की तैयारियों से पहले संत समाज में उठ रही हलचल अब खुलकर सामने आने लगी है। धर्मनगरी हरिद्वार से लेकर नासिक तक साधु-संतों के बीच चल रही खींचतान ने नया मोड़ ले लिया है। परी अखाड़े की शंकराचार्य स्वामी त्रिकाल भवंता महाराज ने ऐसे बयान दिए हैं जिन्होंने धार्मिक गलियारों में सनसनी फैला दी है। उन्होंने सीधे तौर पर श्रीमहंत हरिगिरि पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि कुछ संतों को हाशिये पर धकेलने और आगामी अर्द्धकुंभ की दिशा प्रभावित करने की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं। स्वामी त्रिकाल भवंता का कहना है कि संत समाज में शक्ति प्रदर्शन और दबाव की राजनीति कोई नई बात नहीं है, लेकिन इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि संतों का अपमान करने वालों का अंत सम्मानजनक नहीं रहा। उन्होंने दावा किया कि धर्म की परंपरा में सभी संत समान हैं, लेकिन कुछ लोग अपने प्रभाव और पद के बल पर संत समाज को नियंत्रित करना चाहते हैं।
त्रिकाल भवंता ने वर्ष 2015 के नासिक कुंभ की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय उनके साथ सार्वजनिक रूप से अभद्र व्यवहार किया गया था। उन्होंने दावा किया कि उन्हें अपमानित और दबाने का प्रयास किया गया, लेकिन समय ने सबको जवाब दिया।इतना ही नहीं, उन्होंने वर्ष 2021 के हरिद्वार कुंभ का भी उल्लेख किया। उनका आरोप है कि तत्कालीन अखाड़ा परिषद अध्यक्ष नरेंद्र गिरि के कार्यकाल में हरकी पैड़ी पर आयोजित एक महत्वपूर्ण धार्मिक कार्यक्रम में उनके साथ भेदभाव किया गया और उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया गया। अब स्वामी त्रिकाल भवंता का दावा है कि वैसी ही परिस्थितियां एक बार फिर बन रही हैं और इस बार उनके निशाने पर श्रीमहंत हरिगिरि हैं। उन्होंने कहा कि संत समाज में तानाशाही या दबाव की राजनीति ज्यादा समय तक नहीं चल सकती और सत्य अंततः सामने आता है।
सूत्रों के मुताबिक हाल ही में नासिक में हुई कुछ धार्मिक बैठकों के दौरान मतभेद खुलकर सामने आए हैं। माना जा रहा है कि इन्हीं घटनाओं के बाद संत समाज के भीतर चल रही खींचतान और तेज हो गई है। हालांकि इन आरोपों पर अभी तक श्रीमहंत हरिगिरि की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
OUTRO अर्द्धकुंभ 2027 से पहले संत समाज के भीतर उठी यह बयानबाजी क्या किसी बड़े टकराव का संकेत है या फिर बातचीत से विवाद सुलझ जाएगा? फिलहाल धर्मनगरी में यही चर्चा है कि कुंभ की तैयारियों से पहले संतों के बीच बढ़ती दूरी कहीं आस्था के इस महापर्व पर सवाल न खड़े कर दे।
ध्यान रहे, पत्रकारिता की दृष्टि से किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोपों को तथ्य की तरह नहीं बल्कि “आरोप”, “दावा” या “कथन” के रूप में ही प्रस्तुत करना सुरक्षित और पेशेवर माना जाता

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