हरिद्वार।
इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया के माध्यम से इन दिनों सनातन धर्म के सर्वोच्च पद शंकराचार्य को लेकर चल रहे विवादों ने धर्मप्रेमियों, साधकों और शिष्यों को गहरी चिंता में डाल दिया है। स्वयं को सनातन धर्म का रक्षक बताने वाले कुछ धर्माचार्य, महामंडलेश्वर तथा राजनीतिक व्यक्तित्व सार्वजनिक मंचों और टीवी चैनलों पर एक-दूसरे पर आरोप–प्रत्यारोप लगाते दिखाई दे रहे हैं। इससे न केवल सनातन परंपरा की गरिमा आहत हो रही है, बल्कि समाज में भ्रम और असंतोष भी बढ़ रहा है।
सन 1990 से 2005 तक कनखल स्थित जगतगुरु आश्रम हरिद्वार में जगद्गुरु पीठाधीश्वर ब्रह्मनिष्ठ महामंडलेश्वर स्वामी प्रकाशानंद जी महाराज के सान्निध्य में शिक्षा-दीक्षा प्राप्त कर चुके एक शिष्य का कहना है कि पूर्व में भी विद्वानों और संतों के बीच वैचारिक मतभेद होते थे, किंतु उन्हें आपसी संवाद, शास्त्रार्थ और पंचायत के माध्यम से सुलझा लिया जाता था। आज सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के युग में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत हो गई है।
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि गेरुआ वस्त्र धारण कर कुछ लोग जिस प्रकार सार्वजनिक मंचों पर भाषा की मर्यादा भूलकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हैं, वह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि सनातन संस्कृति की मूल भावना के भी प्रतिकूल है।
आदि शंकराचार्य ने देश में चार प्रमुख पीठ—श्रृंगेरी, द्वारका, पुरी और बदरिकाश्रम—की स्थापना की थी। इसके अतिरिक्त कांची कामकोटि पीठ सहित अन्य पीठों पर भी अभिषिक्त संतों ने शंकराचार्य पदवी धारण की। विद्वानों के अनुसार भानुपुरा पीठ, सुमेरुपीठ आदि स्थानों पर भी शंकराचार्य परंपरा का उल्लेख मिलता है। वर्तमान समय में देशभर में 15 से 20 संत स्वयं को शंकराचार्य बताकर भ्रमण कर रहे हैं, जिससे आम जनमानस में गहरा असमंजस उत्पन्न हो गया है।
विशेष रूप से यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी पर ही “असली और नकली” का प्रश्नचिह्न क्यों लगाया जा रहा है, जबकि अन्य दावेदारों को लेकर वैसी सार्वजनिक बहस या जाँच सामने नहीं आती।
इस पूरे प्रकरण को लेकर बुद्धिजीवियों और शास्त्रज्ञों का स्पष्ट मत है कि अखाड़ा परिषद एवं विद्वत परिषदों को शीघ्र ही निष्पक्ष एवं शास्त्रसम्मत विचार-विमर्श कर इस विषय पर स्पष्ट निर्णय देना चाहिए। यदि समय रहते स्थिति स्पष्ट नहीं की गई, तो इसका दुष्प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विश्व स्तर पर सनातन परंपरा की प्रतिष्ठा को गहरी क्षति पहुँच सकती है।
विद्वान निर्दोष शास्त्री का कहना है कि एक समय था जब संपूर्ण विश्व सनातन परंपरा का सम्मान करता था, किंतु आज आंतरिक कलह और सार्वजनिक विवादों के कारण उसी परंपरा का उपहास किया जा रहा है, जो अत्यंत चिंताजनक है।
उन्होंने आगे कहा कि इतिहास साक्षी है—राजा, महाराजा और राजकुमारों ने राजपाट त्याग कर गेरुए वस्त्र धारण किए और वैराग्यपूर्ण, सादगीभरा जीवन अपनाया। महाराजा मान्धाता, राजा भर्तृहरि, राजकुमार सिद्धार्थ जैसे उदाहरण आज भी प्रेरणास्रोत हैं, जिन्होंने सत्ता छोड़कर संन्यास, योग और बुद्धत्व का मार्ग अपनाया।
परंतु आज स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत दिखाई दे रही है। वैराग्य और गेरुए वस्त्र धारण कर कुछ संत मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की निकटता की होड़ में लगे हुए हैं। संन्यासी और योगी नेताओं के आगे-पीछे घूमते नज़र आ रहे हैं।
उन्होंने प्रश्न उठाया कि ऐसे परिदृश्य में क्या इन संन्यासियों और योगियों से सनातन धर्म के उत्थान या संरक्षण की अपेक्षा की जा सकती है?
इसी संदर्भ में उन्होंने कहा—
“कहते हैं, उलटी गंगा पहाड़ चढ़ी।”
शंकराचार्य पद को लेकर बढ़ता विवाद, सनातन परंपरा की गरिमा पर प्रश्न












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